दिल्ली प्रदर्शन पर UN की चिंता: कानून-व्यवस्था संभालने में दिल्ली पुलिस की सतर्कता और निर्वाचन आयोग की भूमिका भी चर्चा के केंद्र में

नई दिल्ली | 11 अक्टूबर 2026

दिल्ली में प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय की चिंता के बीच दिल्ली पुलिस की सतर्कता, कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी और निर्वाचन आयोग की भूमिका पर भी चर्चा आवश्यक है। UN ने प्रदर्शनकारियों की कथित सामूहिक हिरासत पर चिंता जताते हुए शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का सम्मान करने, पुलिस से संयम बरतने और मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए लोगों को रिहा करने की अपील की है।

मानवाधिकार किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार हैं। हालांकि, पूरे घटनाक्रम का निष्पक्ष मूल्यांकन करते समय पुलिस के सामने मौजूद चुनौतियों, प्रदर्शन की अनुमति से जुड़े विवाद और आयोजकों की जिम्मेदारियों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

भारत ने UN मानवाधिकार कार्यालय की टिप्पणी को बताया अनुचित हस्तक्षेप

दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए जाने की घटनाओं पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (OHCHR) की चिंता के बाद भारत ने कड़ा जवाब दिया है। जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन ने अपने आधिकारिक बयान में UN की टिप्पणियों को “गलत आकलन” बताते हुए भारत के आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप करार दिया।

भारत ने स्पष्ट किया कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में शांतिपूर्ण सभा का अधिकार संविधान द्वारा सुनिश्चित है। देश की मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं, स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र मीडिया नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं। हालांकि, भारत ने यह भी रेखांकित किया कि हर लोकतंत्र में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए शांतिपूर्ण सभा के अधिकार पर कानून के तहत उचित प्रतिबंध लागू हो सकते हैं।

भारतीय मिशन के अनुसार, अधिकारी कानून के अनुरूप कार्य करते हैं और जिन नागरिकों को किसी कार्रवाई से शिकायत है, उनके लिए न्यायालयों के दरवाजे खुले हैं। भारत ने कहा कि OHCHR की चिंताएं ऐसे समय में एकतरफा निष्कर्ष जैसी प्रतीत होती हैं, जब घटना की परिस्थितियों, पुलिस के सामने मौजूद चुनौतियों और कानूनी प्रक्रिया के सभी पहलुओं को देखना आवश्यक है।

भारत ने UN मानवाधिकार कार्यालय से यह भी अपेक्षा जताई कि वह दुनिया के अन्य हिस्सों में होने वाले बड़े प्रदर्शनों पर भी समान गंभीरता से ध्यान दे। भारत के अनुसार, मानवाधिकार संस्थाओं के कामकाज में निष्पक्षता और चयनात्मक रवैये से बचना महत्वपूर्ण है।

यह प्रतिक्रिया दिल्ली पुलिस की भूमिका पर चल रही बहस को एक व्यापक संदर्भ देती है। पुलिस को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निभानी होती है। वहीं, हिरासत से संबंधित प्रत्येक मामले का कानूनी आधार और कार्रवाई की आनुपातिकता भी तथ्यों के आधार पर जांची जानी चाहिए।

भारत का मुख्य तर्क स्पष्ट है: शांतिपूर्ण प्रदर्शन का संवैधानिक अधिकार सुरक्षित है, लेकिन उसका प्रयोग कानून के दायरे में होना चाहिए। साथ ही, किसी भी पुलिस कार्रवाई का मूल्यांकन पूरी परिस्थिति, उपलब्ध साक्ष्यों और न्यायिक समीक्षा की संभावनाओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

दिल्ली पुलिस ने प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार किया था, इसके पीछे आवेदन कम समय पहले दिया जाना और पिछले प्रदर्शन के दौरान शर्तों के कथित उल्लंघन जैसे कारण बताए गए थे। ऐसी परिस्थितियों में पुलिस के सामने सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने, यातायात प्रबंधन और संभावित अप्रिय घटनाओं से निपटने के लिए सतर्क रहने की चुनौती थी।

सतर्कता और तैयारी के लिए दिल्ली पुलिस की भूमिका महत्वपूर्ण

बड़े सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की जिम्मेदारी केवल भीड़ को नियंत्रित करने तक सीमित नहीं होती। आम नागरिकों की सुरक्षा, आपातकालीन सेवाओं की आवाजाही, यातायात व्यवस्था और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा भी उसके कर्तव्यों का हिस्सा हैं।

प्रदर्शन ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरों के इस्तेमाल की खबरें पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं। इन कैमरों की रिकॉर्डिंग से पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई बातचीत तथा घटनाओं के क्रम को समझने में सहायता मिल सकती है। किसी शिकायत की स्थिति में संबंधित फुटेज जांच के लिए उपयोगी साक्ष्य उपलब्ध करा सकती है।

तनावपूर्ण परिस्थितियों में स्पष्ट निर्देश देना, सम्मानजनक भाषा का इस्तेमाल करना और अनावश्यक टकराव से बचना पेशेवर पुलिसिंग के महत्वपूर्ण मानक हैं। जहां उपलब्ध साक्ष्य इन मानकों के पालन की पुष्टि करते हैं, वहां पुलिस के कार्य की उचित सराहना होनी चाहिए।

दिल्ली पुलिस की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी थी। संभावित चुनौतियों के बीच सतर्क रहना और परिस्थितियों के अनुसार कार्रवाई के लिए तैयार रहना पुलिस के कर्तव्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

UN के बयान में पूरे घटनाक्रम के संदर्भ पर भी विचार जरूरीसंयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और मनमानी हिरासत से सुरक्षा पर जोर दिया है। इन चिंताओं पर विचार किया जाना चाहिए। साथ ही, प्रदर्शन की अनुमति क्यों नहीं दी गई, आयोजकों को क्या निर्देश दिए गए और पुलिस किन परिस्थितियों में अपनी जिम्मेदारियां निभा रही थी, इन पहलुओं को भी समझना आवश्यक है।

दिल्ली पुलिस ने कम समय पहले आवेदन किए जाने और पिछले प्रदर्शन के दौरान शर्तों के कथित उल्लंघन का हवाला देते हुए प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार किया था।

हालांकि, अनुमति नहीं मिलने का अर्थ यह नहीं है कि प्रदर्शन में शामिल प्रत्येक व्यक्ति ने अपराध किया। इसी तरह, बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी मात्र से यह निष्कर्ष भी नहीं निकाला जा सकता कि पुलिस की कार्रवाई अनुचित या गैरकानूनी थी।

महत्वपूर्ण सवाल यह हैं कि क्या पुलिस ने कानून के अनुसार कार्रवाई की, क्या उठाए गए कदम आवश्यक और परिस्थितियों के अनुपात में थे तथा क्या प्रत्येक हिरासत के लिए वैध कानूनी आधार मौजूद था। इन सवालों का उत्तर तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर दिया जाना चाहिए।

UN की चिंताओं के साथ-साथ पुलिस द्वारा बताए गए कारणों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करना भी जरूरी है। लोकतंत्र में मानवाधिकारों की रक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखना परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक दायित्व हैं।

अभिजीत दीपके के मामले में मानवीय पहलू

CJP संस्थापक अभिजीत दीपके से जुड़ा घटनाक्रम भी पुलिस की भूमिका के आकलन में प्रासंगिक है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, महाराष्ट्र के हिंगोली जिले स्थित उनके गांव में उनकी दादी के निधन की सूचना मिलने के बाद उन्हें मानवीय आधार पर रिहा किया गया, ताकि वे परिवार के अंतिम संस्कार में शामिल हो सकें।

यदि विश्वसनीय स्रोतों से इसकी पुष्टि होती है, तो यह घटनाक्रम कानून-व्यवस्था से जुड़ी कार्रवाई के दौरान व्यक्तिगत और मानवीय परिस्थितियों पर विचार किए जाने को दर्शाता है। पुलिस के कामकाज का मूल्यांकन करते समय ऐसे पहलुओं को भी उचित स्थान मिलना चाहिए।हालांकि, किसी एक मामले में मानवीय आधार पर राहत दिए जाने से अन्य लोगों की हिरासत की वैधता स्वतः साबित नहीं होती। प्रत्येक मामले का आकलन उसके तथ्यों और कानूनी आधार पर किया जाना चाहिए।

आयोजकों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण

सार्वजनिक प्रदर्शनों को शांतिपूर्ण और व्यवस्थित बनाए रखने के लिए आयोजकों तथा पुलिस के बीच सहयोग आवश्यक है। आयोजकों की जिम्मेदारी है कि वे लागू प्रक्रियाओं का पालन करें, अधिकारियों के साथ समन्वय बनाए रखें और अव्यवस्था रोकने के लिए उचित कदम उठाएं।

दूसरी ओर, पुलिस को कानून के अनुरूप और परिस्थितियों के अनुपात में कार्रवाई करनी चाहिए।

यदि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, यातायात बाधित करने या अन्य अपराधों के संबंध में पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं, तो जांच के बाद कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन किसी आरोप को बिना प्रमाण के स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।

इसी प्रकार, केवल ऐसे प्रदर्शन में शामिल होने के कारण किसी शांतिपूर्ण प्रतिभागी को अपराधी नहीं माना जा सकता, जिसकी अनुमति नहीं दी गई थी। प्रत्येक व्यक्ति के आचरण और उसके विरुद्ध कार्रवाई के कानूनी आधार को अलग-अलग देखना आवश्यक है।

पुलिस की चुनौतियों को समझना और उसकी कार्रवाई की समीक्षा करना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। कानून के शासन में दोनों का समान महत्व है।

124 पूर्व अधिकारियों और 42 पूर्व न्यायाधीशों ने किया निर्वाचन आयोग का समर्थनमतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच कई पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों और न्यायाधीशों ने निर्वाचन आयोग की भूमिका तथा संवैधानिक जिम्मेदारियों का समर्थन किया है।मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 124 पूर्व IAS, IFS और अन्य सेवाओं के अधिकारियों ने निर्वाचन आयोग तथा SIR प्रक्रिया के समर्थन में एक खुला पत्र जारी किया। इससे पहले 42 पूर्व न्यायाधीशों ने भी निर्वाचन आयोग के समर्थन में अपनी राय रखी थी। रिपोर्टों के अनुसार, इनमें सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश भी शामिल थे।इन पत्रों में व्यक्त विचार इस बहस का एक महत्वपूर्ण पक्ष प्रस्तुत करते हैं। हस्ताक्षरकर्ताओं ने निर्वाचन आयोग की भूमिका और मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया का समर्थन करते हुए संवैधानिक संस्थाओं के प्रति विश्वास बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

इन पत्रों को उनके हस्ताक्षरकर्ताओं की राय के रूप में देखा जाना चाहिए। वे अपने आप में न्यायपालिका या सभी पूर्व अधिकारियों की सर्वसम्मत राय का प्रमाण नहीं हैं। फिर भी, वे यह दर्शाते हैं कि SIR और निर्वाचन आयोग की भूमिका पर सार्वजनिक बहस में संस्थागत समर्थन का पक्ष भी मौजूद है।

SIR का उद्देश्य और मतदाताओं के अधिकारनिर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण करने का उद्देश्य सूची की सटीकता और विश्वसनीयता में सुधार करना है। इस प्रक्रिया में मृत मतदाताओं के नामों की पहचान, दोहरी प्रविष्टियों का निराकरण तथा स्थान बदल चुके या लागू नियमों के अनुसार अपात्र हो चुके व्यक्तियों की प्रविष्टियों की जांच शामिल हो सकती है।

सटीक मतदाता सूची स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि किसी पात्र नागरिक का नाम गलती से न हटे और त्रुटियों को सुधारने के लिए प्रभावी व्यवस्था उपलब्ध हो।

निर्वाचन आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी और प्रक्रिया पर सवाल उठाने का नागरिकों का अधिकार एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। SIR से संबंधित आरोपों और आपत्तियों का मूल्यांकन आधिकारिक रिकॉर्ड, प्रमाणित मामलों तथा निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं के आधार पर होना चाहिए।मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना और पात्र नागरिकों के मतदान अधिकारों की रक्षा करना—दोनों लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं।

निष्कर्ष: कानून, जवाबदेही और लोकतांत्रिक विश्वासदिल्ली का घटनाक्रम बड़े सार्वजनिक प्रदर्शनों के प्रबंधन की जटिलता को सामने लाता है। पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने और संभावित परिस्थितियों के लिए सतर्क रहने की जिम्मेदारी निभानी होती है, जबकि प्रदर्शन आयोजकों को लागू नियमों और वैध निर्देशों का सम्मान करना चाहिए।

UN की मनमानी हिरासत संबंधी चिंताओं की जांच होनी चाहिए, लेकिन पुलिस द्वारा बताए गए कारणों, उसकी तैयारी और उपलब्ध साक्ष्यों को भी निष्पक्ष रूप से परखा जाना चाहिए। इसी तरह, निर्वाचन आयोग के SIR कार्यक्रम पर बहस तथ्यों, पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रियाओं के आधार पर आगे बढ़नी चाहिए।

लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार, कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही—तीनों का समान महत्व है। दिल्ली पुलिस की सतर्कता और पेशेवर कार्यप्रणाली का मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर होना चाहिए और जहां उसके कार्य की सराहना के प्रमाण हों, उन्हें भी सामने रखा जाना चाहिए। साथ ही, मानवाधिकारों और कानून के शासन के मानक सभी पक्षों पर समान रूप से लागू होने चाहिए।

डीआरआई की बड़ी कार्रवाई: असम, मिजोरम और मुंबई में 35 करोड़ रुपये से अधिक की तस्करी सामग्री जब्त

नई दिल्ली, 25 सितंबर 2026: सीमा पार तस्करी के खिलाफ जारी अभियान में डायरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस (DRI) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए असम, मिजोरम और मुंबई में विदेशी मूल की सुपारी, खसखस और सोना जब्त किया है। इन अलग-अलग अभियानों में जब्त सामग्री का कुल अनुमानित मूल्य 35.12 करोड़ रुपये से अधिक बताया गया है।

डीआरआई के अनुसार, मिजोरम और असम में की गई कार्रवाई में 1,25,680 किलोग्राम विदेशी मूल की सुपारी और 41,697 किलोग्राम विदेशी मूल का खसखस बरामद किया गया, जिसकी संयुक्त कीमत करीब 20.31 करोड़ रुपये है। वहीं मुंबई एयरपोर्ट पर एक अलग कार्रवाई में 9.40 किलोग्राम विदेशी मूल का सोना, जिसकी कीमत करीब 14.81 करोड़ रुपये है, जब्त किया गया।

भारत-म्यांमार सीमा के पास बड़ी सुपारी बरामदगी

23-24 सितंबर को मिजोरम के चंफाई जिले में डीआरआई ने कस्टम्स चंफाई, असम राइफल्स की 14वीं बटालियन और चंफाई पुलिस के सहयोग से रुआंतलांग गांव के आसपास तीन गोदामों की तलाशी ली।

ये गोदाम भारत-म्यांमार सीमा से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित थे और तलाशी के समय बंद एवं लावारिस पाए गए। तलाशी के दौरान 1,25,680 किलोग्राम संदिग्ध विदेशी मूल की सुपारी, जिसकी कीमत लगभग 14 करोड़ रुपये है, बरामद की गई। इसके अलावा 25,440 किलोग्राम खसखस, जिसकी कीमत लगभग 3.81 करोड़ रुपये बताई गई, भी मिला।

प्रारंभिक जांच में संकेत मिला कि इन वस्तुओं को म्यांमार से भारत में तस्करी के जरिए लाया गया था। सामान को सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 के तहत जब्त किया गया।

डीआरआई ने इस सुपारी बरामदगी को उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में हाल के वर्षों में हुई सबसे बड़ी बरामदगियों में से एक बताया है।

असम में दो ट्रकों से 16 टन से अधिक खसखस बरामद

22 सितंबर को विशेष खुफिया सूचना के आधार पर डीआरआई अधिकारियों ने असम राइफल्स की 38वीं बटालियन की सहायता से सिलचर के पास लैलापुर में दो ट्रकों को रोका।

वाहनों की विस्तृत जांच के दौरान 290 एचडीपीई बैगों में 16,257 किलोग्राम विदेशी मूल का खसखस बरामद हुआ। इसकी अनुमानित कीमत करीब 2.43 करोड़ रुपये बताई गई है।

डीआरआई के अनुसार, बैगों पर विदेशी निर्माण एवं व्यापार से संबंधित चिह्न थे और खेप के साथ वैध आयात दस्तावेज मौजूद नहीं थे। खसखस और दोनों वाहनों को सीमा शुल्क अधिनियम के तहत जब्त किया गया तथा परिवहन में शामिल चार लोगों को गिरफ्तार किया गया।

डीआरआई ने बताया कि खसखस विदेश व्यापार नीति के ITC (HS) वर्गीकरण के तहत एक ‘Restricted’ वस्तु है और इसके आयात के लिए निर्धारित शर्तों का पालन आवश्यक है।

मुंबई एयरपोर्ट पर खाने के सामान में छिपाकर लाया गया सोना

इसी बीच मुंबई में डीआरआई की एक अलग कार्रवाई में सोने की तस्करी का एक असामान्य तरीका सामने आया।

डीआरआई मुंबई जोनल यूनिट ने 23 सितंबर की सुबह दुबई से मुंबई पहुंचे तीन भारतीय यात्रियों को छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर विशेष सूचना के आधार पर रोका। एयर इंटेलिजेंस यूनिट और मुंबई एयरपोर्ट कस्टम्स की सहायता से उनके सामान की विस्तृत जांच की गई।

जांच में सामने आया कि विदेशी मूल के सोने को बारीक पाउडर में बदलकर मिल्क पाउडर, ओट्स, विभिन्न प्रकार के आटे, न्यूटेला और नारियल के दूध के पाउडर जैसे सामान्य खाद्य उत्पादों में मिलाया गया था।

तीनों यात्रियों के सामान से करीब 33.50 किलोग्राम ऐसे खाद्य उत्पाद बरामद हुए जिनमें सोने का पाउडर मिला हुआ था। अलग करने और जांच के बाद 9.40 किलोग्राम विदेशी मूल का सोना बरामद किया गया, जिसकी कीमत लगभग 14.81 करोड़ रुपये आंकी गई।

सोने को सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 के संबंधित प्रावधानों के तहत जब्त किया गया। पूछताछ के दौरान तीनों यात्रियों ने कथित तौर पर एक ही संगठित सोना तस्करी सिंडिकेट की ओर से काम करने की बात स्वीकार की। तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया।

अलग-अलग तरीकों से तस्करी नेटवर्क पर कार्रवाई

डीआरआई की इन कार्रवाइयों में तस्करी के अलग-अलग तरीकों की तस्वीर सामने आती है। भारत-म्यांमार सीमा से बड़े पैमाने पर कृषि उत्पादों की कथित तस्करी से लेकर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर खाद्य पदार्थों में सोने का पाउडर छिपाने तक, तस्कर जांच एजेंसियों से बचने के लिए अलग-अलग तरीके अपना रहे हैं।

असम और मिजोरम की कार्रवाइयों में बड़ी मात्रा में विदेशी मूल की सुपारी और प्रतिबंधित श्रेणी का खसखस जब्त किया गया, जबकि मुंबई में अत्यधिक छिपाव वाले तरीके से लाया जा रहा करोड़ों रुपये का सोना पकड़ा गया।

डीआरआई के अनुसार, इन कार्रवाइयों में कुल मिलाकर 35.12 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की सामग्री जब्त की गई और सात लोगों को गिरफ्तार किया गया। एजेंसी का कहना है कि ये कार्रवाई भारत-म्यांमार सीमा तथा अन्य संवेदनशील मार्गों से संचालित तस्करी नेटवर्क को रोकने के प्रयासों का हिस्सा हैं।

नालागढ़ IED विस्फोट मामले में NIA ने तीन और आरोपियों को किया गिरफ्तार कुल गिरफ्तारियां छह हुईं, बड़ी साजिश और नेटवर्क की जांच जारी

नई दिल्ली, 31 अगस्त 2026: राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने हिमाचल प्रदेश के नालागढ़ पुलिस स्टेशन में 1 जनवरी 2026 को हुए IED विस्फोट के मामले में तीन और आरोपियों को गिरफ्तार किया है। इन गिरफ्तारियों के बाद मामले में NIA द्वारा गिरफ्तार आरोपियों की कुल संख्या छह हो गई है।

NIA के अनुसार, विस्फोट सुबह करीब 9:40 बजे नालागढ़ पुलिस स्टेशन परिसर में जांच अधिकारी के कमरे से लगी बाहरी दीवार के पास हुआ था। मामले में शुरुआत में नालागढ़ पुलिस स्टेशन में FIR No. 02/2026 दर्ज की गई थी। बाद में NIA ने 8 मई 2026 को जांच अपने हाथ में लेते हुए RC-27/2026/NIA/DLI के रूप में मामला फिर से दर्ज किया।

जांच के दौरान NIA ने अरशदीप सिंह उर्फ अर्श कंडोला, करणप्रताप और दिलजोत सैनी की कथित संलिप्तता स्थापित की। तीनों पंजाब के SBS नगर जिले के राहों क्षेत्र के निवासी बताए गए हैं। NIA ने इन्हें इस मामले में गिरफ्तार किया है। तीनों पहले से पंजाब के गढ़शंकर थाने में दर्ज FIR No. 11/2026 के सिलसिले में गिरफ्तार थे।

इससे पहले NIA ने मामले में महावीर कुमार उर्फ काका, अजय मेहरा और मनप्रीत सिंह उर्फ मनी को गिरफ्तार किया था। इन आरोपियों को पहले पंजाब पुलिस ने SSOC, मोहाली की FIR No. 02/2026 के संबंध में गिरफ्तार किया था, जिसके बाद NIA ने नालागढ़ IED विस्फोट मामले में उन्हें गिरफ्तार किया।

NIA ने बताया कि जांच का उद्देश्य विस्फोट के पीछे की बड़ी साजिश का पता लगाना, इसमें शामिल सभी लोगों की पहचान करना तथा घटना से जुड़े व्यापक नेटवर्क और आपराधिक संबंधों को उजागर करना है।

एजेंसी के मुताबिक, आरोपियों की सटीक भूमिका, आपसी कड़ियों और साजिश में शामिल अन्य लोगों का पता लगाने के लिए आगे की जांच जारी है।

NHRC Seeks Report in Suspicious Death of NEET Aspirant in Patna

New Delhi 27 Jan 2026

The National Human Rights Commission (NHRC) has taken cognizance of a complaint alleging serious human rights violations in the suspicious death of a young girl student preparing for the National Eligibility cum Entrance Test (NEET) in Patna, Bihar. The Commission has directed the Commissioner of Police, Patna, to submit an Action Taken Report (ATR) within two weeks.

The issue was submitted by Citizen Rights Protection Council (CRPC), raising concerns over the circumstances surrounding the student’s death and the manner in which the case was initially handled by local authorities. After examining the material on record, the NHRC observed that the allegations prima facie disclose violation of human rights and issued notice under Section 12 of the Protection of Human Rights Act, 1993.

Allegations and Investigation Concerns

According to the complaint, the student was residing in a private girls’ hostel in Patna and was found unconscious on January 6, 2026. She was reportedly taken to multiple hospitals without immediate intimation to the local police, a lapse that has raised serious questions regarding adherence to medico-legal protocols. The student later died on January 11, 2026, after being treated at three different hospitals.

The family of the deceased has alleged that blood-stained clothes were discarded, pointing to possible destruction of evidence. It has also been alleged that hostel management and hospital staff may have acted in collusion, and that an attempt was made to settle the matter when the student slipped into a coma.

The post-mortem report reportedly indicates multiple injuries, including injuries on private parts, with samples sent for forensic examination. The family has further alleged that despite the gravity of the case, there were serious lapses by the investigation team, including delay in securing evidence and lack of transparency, prompting the need for intervention by independent institutions.

NHRC Directions

Taking note of the seriousness of the allegations, the NHRC Bench, presided over by Shri Priyank Kanoongo, has directed the Commissioner of Police, Patna, to conduct a thorough and impartial inquiry and submit a detailed report to the Commission through the HRCNet portal, in accordance with NHRC procedures.

Need for Oversight and Accountability

The case underscores the critical role of constitutional bodies like the NHRC and human rights organisations such as Citizen Rights Protection Council (CRPC) in ensuring accountability when families allege investigative failures, suppression of evidence, or institutional negligence. Such interventions are considered essential to safeguard human rights and ensure that investigations remain fair, transparent, and free from influence.

The incident has once again raised broader concerns regarding the safety of students in private hostels, handling of suspicious deaths, and the need for timely police action in medico-legal cases.

The circumstances surrounding the death of a young student reveal serious and disturbing lapses at multiple levels — from delayed police intimation to alleged mishandling of crucial evidence. When families raise credible concerns about the investigation itself, intervention by constitutional bodies like the NHRC and vigilant civil society organisations becomes not just necessary, but unavoidable. Justice cannot be compromised by negligence, influence, or silence. Accountability must be fixed, and the truth must come out, without fear or favour.”

— Manish Jain, Public Relationship Officer,

Citizen Rights Protection Council (CRPC)