दिल्ली प्रदर्शन पर UN की चिंता: कानून-व्यवस्था संभालने में दिल्ली पुलिस की सतर्कता और निर्वाचन आयोग की भूमिका भी चर्चा के केंद्र में

नई दिल्ली | 11 अक्टूबर 2026

दिल्ली में प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय की चिंता के बीच दिल्ली पुलिस की सतर्कता, कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी और निर्वाचन आयोग की भूमिका पर भी चर्चा आवश्यक है। UN ने प्रदर्शनकारियों की कथित सामूहिक हिरासत पर चिंता जताते हुए शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का सम्मान करने, पुलिस से संयम बरतने और मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए लोगों को रिहा करने की अपील की है।

मानवाधिकार किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार हैं। हालांकि, पूरे घटनाक्रम का निष्पक्ष मूल्यांकन करते समय पुलिस के सामने मौजूद चुनौतियों, प्रदर्शन की अनुमति से जुड़े विवाद और आयोजकों की जिम्मेदारियों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

भारत ने UN मानवाधिकार कार्यालय की टिप्पणी को बताया अनुचित हस्तक्षेप

दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए जाने की घटनाओं पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (OHCHR) की चिंता के बाद भारत ने कड़ा जवाब दिया है। जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन ने अपने आधिकारिक बयान में UN की टिप्पणियों को “गलत आकलन” बताते हुए भारत के आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप करार दिया।

भारत ने स्पष्ट किया कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में शांतिपूर्ण सभा का अधिकार संविधान द्वारा सुनिश्चित है। देश की मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं, स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र मीडिया नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं। हालांकि, भारत ने यह भी रेखांकित किया कि हर लोकतंत्र में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए शांतिपूर्ण सभा के अधिकार पर कानून के तहत उचित प्रतिबंध लागू हो सकते हैं।

भारतीय मिशन के अनुसार, अधिकारी कानून के अनुरूप कार्य करते हैं और जिन नागरिकों को किसी कार्रवाई से शिकायत है, उनके लिए न्यायालयों के दरवाजे खुले हैं। भारत ने कहा कि OHCHR की चिंताएं ऐसे समय में एकतरफा निष्कर्ष जैसी प्रतीत होती हैं, जब घटना की परिस्थितियों, पुलिस के सामने मौजूद चुनौतियों और कानूनी प्रक्रिया के सभी पहलुओं को देखना आवश्यक है।

भारत ने UN मानवाधिकार कार्यालय से यह भी अपेक्षा जताई कि वह दुनिया के अन्य हिस्सों में होने वाले बड़े प्रदर्शनों पर भी समान गंभीरता से ध्यान दे। भारत के अनुसार, मानवाधिकार संस्थाओं के कामकाज में निष्पक्षता और चयनात्मक रवैये से बचना महत्वपूर्ण है।

यह प्रतिक्रिया दिल्ली पुलिस की भूमिका पर चल रही बहस को एक व्यापक संदर्भ देती है। पुलिस को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निभानी होती है। वहीं, हिरासत से संबंधित प्रत्येक मामले का कानूनी आधार और कार्रवाई की आनुपातिकता भी तथ्यों के आधार पर जांची जानी चाहिए।

भारत का मुख्य तर्क स्पष्ट है: शांतिपूर्ण प्रदर्शन का संवैधानिक अधिकार सुरक्षित है, लेकिन उसका प्रयोग कानून के दायरे में होना चाहिए। साथ ही, किसी भी पुलिस कार्रवाई का मूल्यांकन पूरी परिस्थिति, उपलब्ध साक्ष्यों और न्यायिक समीक्षा की संभावनाओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

दिल्ली पुलिस ने प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार किया था, इसके पीछे आवेदन कम समय पहले दिया जाना और पिछले प्रदर्शन के दौरान शर्तों के कथित उल्लंघन जैसे कारण बताए गए थे। ऐसी परिस्थितियों में पुलिस के सामने सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने, यातायात प्रबंधन और संभावित अप्रिय घटनाओं से निपटने के लिए सतर्क रहने की चुनौती थी।

सतर्कता और तैयारी के लिए दिल्ली पुलिस की भूमिका महत्वपूर्ण

बड़े सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की जिम्मेदारी केवल भीड़ को नियंत्रित करने तक सीमित नहीं होती। आम नागरिकों की सुरक्षा, आपातकालीन सेवाओं की आवाजाही, यातायात व्यवस्था और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा भी उसके कर्तव्यों का हिस्सा हैं।

प्रदर्शन ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरों के इस्तेमाल की खबरें पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं। इन कैमरों की रिकॉर्डिंग से पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई बातचीत तथा घटनाओं के क्रम को समझने में सहायता मिल सकती है। किसी शिकायत की स्थिति में संबंधित फुटेज जांच के लिए उपयोगी साक्ष्य उपलब्ध करा सकती है।

तनावपूर्ण परिस्थितियों में स्पष्ट निर्देश देना, सम्मानजनक भाषा का इस्तेमाल करना और अनावश्यक टकराव से बचना पेशेवर पुलिसिंग के महत्वपूर्ण मानक हैं। जहां उपलब्ध साक्ष्य इन मानकों के पालन की पुष्टि करते हैं, वहां पुलिस के कार्य की उचित सराहना होनी चाहिए।

दिल्ली पुलिस की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी थी। संभावित चुनौतियों के बीच सतर्क रहना और परिस्थितियों के अनुसार कार्रवाई के लिए तैयार रहना पुलिस के कर्तव्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

UN के बयान में पूरे घटनाक्रम के संदर्भ पर भी विचार जरूरीसंयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और मनमानी हिरासत से सुरक्षा पर जोर दिया है। इन चिंताओं पर विचार किया जाना चाहिए। साथ ही, प्रदर्शन की अनुमति क्यों नहीं दी गई, आयोजकों को क्या निर्देश दिए गए और पुलिस किन परिस्थितियों में अपनी जिम्मेदारियां निभा रही थी, इन पहलुओं को भी समझना आवश्यक है।

दिल्ली पुलिस ने कम समय पहले आवेदन किए जाने और पिछले प्रदर्शन के दौरान शर्तों के कथित उल्लंघन का हवाला देते हुए प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार किया था।

हालांकि, अनुमति नहीं मिलने का अर्थ यह नहीं है कि प्रदर्शन में शामिल प्रत्येक व्यक्ति ने अपराध किया। इसी तरह, बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी मात्र से यह निष्कर्ष भी नहीं निकाला जा सकता कि पुलिस की कार्रवाई अनुचित या गैरकानूनी थी।

महत्वपूर्ण सवाल यह हैं कि क्या पुलिस ने कानून के अनुसार कार्रवाई की, क्या उठाए गए कदम आवश्यक और परिस्थितियों के अनुपात में थे तथा क्या प्रत्येक हिरासत के लिए वैध कानूनी आधार मौजूद था। इन सवालों का उत्तर तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर दिया जाना चाहिए।

UN की चिंताओं के साथ-साथ पुलिस द्वारा बताए गए कारणों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करना भी जरूरी है। लोकतंत्र में मानवाधिकारों की रक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखना परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक दायित्व हैं।

अभिजीत दीपके के मामले में मानवीय पहलू

CJP संस्थापक अभिजीत दीपके से जुड़ा घटनाक्रम भी पुलिस की भूमिका के आकलन में प्रासंगिक है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, महाराष्ट्र के हिंगोली जिले स्थित उनके गांव में उनकी दादी के निधन की सूचना मिलने के बाद उन्हें मानवीय आधार पर रिहा किया गया, ताकि वे परिवार के अंतिम संस्कार में शामिल हो सकें।

यदि विश्वसनीय स्रोतों से इसकी पुष्टि होती है, तो यह घटनाक्रम कानून-व्यवस्था से जुड़ी कार्रवाई के दौरान व्यक्तिगत और मानवीय परिस्थितियों पर विचार किए जाने को दर्शाता है। पुलिस के कामकाज का मूल्यांकन करते समय ऐसे पहलुओं को भी उचित स्थान मिलना चाहिए।हालांकि, किसी एक मामले में मानवीय आधार पर राहत दिए जाने से अन्य लोगों की हिरासत की वैधता स्वतः साबित नहीं होती। प्रत्येक मामले का आकलन उसके तथ्यों और कानूनी आधार पर किया जाना चाहिए।

आयोजकों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण

सार्वजनिक प्रदर्शनों को शांतिपूर्ण और व्यवस्थित बनाए रखने के लिए आयोजकों तथा पुलिस के बीच सहयोग आवश्यक है। आयोजकों की जिम्मेदारी है कि वे लागू प्रक्रियाओं का पालन करें, अधिकारियों के साथ समन्वय बनाए रखें और अव्यवस्था रोकने के लिए उचित कदम उठाएं।

दूसरी ओर, पुलिस को कानून के अनुरूप और परिस्थितियों के अनुपात में कार्रवाई करनी चाहिए।

यदि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, यातायात बाधित करने या अन्य अपराधों के संबंध में पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं, तो जांच के बाद कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन किसी आरोप को बिना प्रमाण के स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।

इसी प्रकार, केवल ऐसे प्रदर्शन में शामिल होने के कारण किसी शांतिपूर्ण प्रतिभागी को अपराधी नहीं माना जा सकता, जिसकी अनुमति नहीं दी गई थी। प्रत्येक व्यक्ति के आचरण और उसके विरुद्ध कार्रवाई के कानूनी आधार को अलग-अलग देखना आवश्यक है।

पुलिस की चुनौतियों को समझना और उसकी कार्रवाई की समीक्षा करना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। कानून के शासन में दोनों का समान महत्व है।

124 पूर्व अधिकारियों और 42 पूर्व न्यायाधीशों ने किया निर्वाचन आयोग का समर्थनमतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच कई पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों और न्यायाधीशों ने निर्वाचन आयोग की भूमिका तथा संवैधानिक जिम्मेदारियों का समर्थन किया है।मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 124 पूर्व IAS, IFS और अन्य सेवाओं के अधिकारियों ने निर्वाचन आयोग तथा SIR प्रक्रिया के समर्थन में एक खुला पत्र जारी किया। इससे पहले 42 पूर्व न्यायाधीशों ने भी निर्वाचन आयोग के समर्थन में अपनी राय रखी थी। रिपोर्टों के अनुसार, इनमें सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश भी शामिल थे।इन पत्रों में व्यक्त विचार इस बहस का एक महत्वपूर्ण पक्ष प्रस्तुत करते हैं। हस्ताक्षरकर्ताओं ने निर्वाचन आयोग की भूमिका और मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया का समर्थन करते हुए संवैधानिक संस्थाओं के प्रति विश्वास बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

इन पत्रों को उनके हस्ताक्षरकर्ताओं की राय के रूप में देखा जाना चाहिए। वे अपने आप में न्यायपालिका या सभी पूर्व अधिकारियों की सर्वसम्मत राय का प्रमाण नहीं हैं। फिर भी, वे यह दर्शाते हैं कि SIR और निर्वाचन आयोग की भूमिका पर सार्वजनिक बहस में संस्थागत समर्थन का पक्ष भी मौजूद है।

SIR का उद्देश्य और मतदाताओं के अधिकारनिर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण करने का उद्देश्य सूची की सटीकता और विश्वसनीयता में सुधार करना है। इस प्रक्रिया में मृत मतदाताओं के नामों की पहचान, दोहरी प्रविष्टियों का निराकरण तथा स्थान बदल चुके या लागू नियमों के अनुसार अपात्र हो चुके व्यक्तियों की प्रविष्टियों की जांच शामिल हो सकती है।

सटीक मतदाता सूची स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि किसी पात्र नागरिक का नाम गलती से न हटे और त्रुटियों को सुधारने के लिए प्रभावी व्यवस्था उपलब्ध हो।

निर्वाचन आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी और प्रक्रिया पर सवाल उठाने का नागरिकों का अधिकार एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। SIR से संबंधित आरोपों और आपत्तियों का मूल्यांकन आधिकारिक रिकॉर्ड, प्रमाणित मामलों तथा निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं के आधार पर होना चाहिए।मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना और पात्र नागरिकों के मतदान अधिकारों की रक्षा करना—दोनों लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं।

निष्कर्ष: कानून, जवाबदेही और लोकतांत्रिक विश्वासदिल्ली का घटनाक्रम बड़े सार्वजनिक प्रदर्शनों के प्रबंधन की जटिलता को सामने लाता है। पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने और संभावित परिस्थितियों के लिए सतर्क रहने की जिम्मेदारी निभानी होती है, जबकि प्रदर्शन आयोजकों को लागू नियमों और वैध निर्देशों का सम्मान करना चाहिए।

UN की मनमानी हिरासत संबंधी चिंताओं की जांच होनी चाहिए, लेकिन पुलिस द्वारा बताए गए कारणों, उसकी तैयारी और उपलब्ध साक्ष्यों को भी निष्पक्ष रूप से परखा जाना चाहिए। इसी तरह, निर्वाचन आयोग के SIR कार्यक्रम पर बहस तथ्यों, पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रियाओं के आधार पर आगे बढ़नी चाहिए।

लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार, कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही—तीनों का समान महत्व है। दिल्ली पुलिस की सतर्कता और पेशेवर कार्यप्रणाली का मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर होना चाहिए और जहां उसके कार्य की सराहना के प्रमाण हों, उन्हें भी सामने रखा जाना चाहिए। साथ ही, मानवाधिकारों और कानून के शासन के मानक सभी पक्षों पर समान रूप से लागू होने चाहिए।

आंध्रप्रदेश, बिहार ने उठाई विशेष दर्जे की मांग, पीएम मोदी ने दिया आश्वासन

आंध्रप्रदेश, बिहार ने उठाई विशेष दर्जे की मांग, पीएम मोदी ने दिया आश्वासन

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को नीति आयोग की बैठक में आंध्रप्रदेश और बिहार जैसे राज्यों को विशेष दर्जा प्रदान करने की मांग पर कहा कि केंद्र सरकार राज्यों के बंटवारे के समय तय किए गए वैधानिक प्रावधानों को अक्षरश: पालन करने को प्रतिबद्ध है. नीति आयोग की प्रबंध समिति की चौथी बैठक के बाद संवददाताओं को बैठक की जानकारी देते हुए आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कहा कि मुख्यमंत्रियों की बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ राज्यों द्वारा विशेष दर्जा की मांग पर केंद्र सरकार का रुख स्पष्ट किया.

आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने राज्य को विशेष केटेगरी का दर्जा प्रदान करने की अपनी लंबित मांग का मुद्दा उठाया जिसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने समर्थन दिया. इस पर प्रधानमंत्री ने उन्हें वैधानिक प्रावधानों का पालन करने का आश्वासन दिया.

राजीव कुमार ने बताया, “कुछ राज्यों ने विशेष दर्जा का मुद्दा उठाया. बातचीत वैधानिक प्रावधानों पर केंद्रित थी, जोकि राज्यों के बंटवारे के समय तय किए गए थे. प्रधानमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार उन प्रावधानों का अनुपालन अक्षरश: करने को प्रतिबद्ध है.”

Nitish kumar

राजीव कुमार ने कहा, “विस्तृत योजना तैयार की जा रही है और एमएसपी 1.5 गुना बढ़ाने के प्रधानमंत्री के वादे को पूरा करने के लिए राज्यों को कई विकल्प प्रदान किए जाएंगे.”

कुमार ने कहा कि नीति आयोग (पूर्व में योजना आयोग) के अध्यक्ष प्रधानमंत्री ने किसानों के मसलों की जांच-पड़ताल के लिए एक समिति का गठन करने का निर्देश दिया है. नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने बताया कि विचार-विमर्श के दौरान राज्यों को अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लक्ष्य तय करने का सुझाव भी दिया गया.

विपक्ष ने की मांग- 50 फीसदी चुनाव EVM और आधा बैलेट पेपर से हो

विपक्ष ने की मांग- 50 फीसदी चुनाव EVM और आधा बैलेट पेपर से होनई दिल्ली : विपक्षी दलों ने हाल ही में उपचुनावों के दौरान ईवीएम में कथित गड़बड़ी के हवाले से आधा चुनाव ईवीएम से और आधा मतपत्र से कराने की मांग उठाई है. राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलामनबी आजाद की अगुवाई में विपक्षी दल के नेताओं का प्रतिनिधिमंडल आज शाम चुनाव आयोग से यह मांग करेगा.

चुनाव आयोग के समक्ष मुद्दा उठाएगा विपक्ष

आजाद की अध्यक्षता में आज जनता दल यू, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल के नेताओं की बैठक में ईवीएम की गड़बड़ी के मुद्दे को एकजुट होकर चुनाव आयोग के समक्ष उठाने का निर्णय किया गया. बैठक में मौजूद एक नेता ने बताया कि इस साल के अंत तक गुजरात और हिमाचल प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव की आधी सीटों पर ईवीएम से और आधी सीटों पर मतपत्र से मतदान कराने की आयोग से मांग करने पर बैठक में सहमति बनी है.

ईवीएम से छेड़छाड़ का विपक्ष का है आरोप

ऐसा होने पर ईवीएम में छेड़छाड़ की लगातार बढ़ रही शिकायतों से समूची निर्वाचन प्रणाली पर उठ रही शंकाओं का भी निराकरण हो सकेगा और मशीनों में छेड़छाड़ नहीं हो सकने के चुनाव आयोग के दावे की पुष्टि हो जायेगी. विपक्षी दल एकजुट होकर भविष्य में होने वाले सभी चुनावों में पेपर ट्रेल मशीन (वीवीपीएटी) से चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं. जबकि कांग्रेस ईवीएम में कथित छेड़छाड़ के मद्देजनर मशीन के बजाय मतपत्र के इस्तेमाल पर जोर दे रही है.

विपक्ष के नेता उठाएंगे मु्द्दा

एक नेता ने कहा, ‘इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आवश्यक किसी भी बुनियादी सिद्धांत के उल्लंघन पर तत्काल एवं गंभीरता के साथ कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता है.’ संसद भवन परिसर स्थित आजाद के कार्यालय में हुई बैठक में कांग्रेस नेताओं अहमद पटेल, आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल और विवेक तनखा के अलावा जदयू नेता अली अनवर अंसारी, तृणमूल नेता सुखेंदु शेखर रॉय, बसपा नेता सतीश मिश्रा और सपा नेता नीरज शेखर मौजूद थे. राकांपा नेता मजीद मेमन, माकपा नेता डी राजा और राजद नेता जे पी नारायण यादव भी बैठक में मौजूद थे. सभी नेताओं ने इस मुद्दे को मजबूती से चुनाव आयोग के समक्ष उठाने का निर्णय लिया है.

EVM को बलि का बकरा न बनाएं, बैलेट पेपर को वापस लाने का सवाल ही नहीं : चुनाव आयोग

EVM को बलि का बकरा न बनाएं, बैलेट पेपर को वापस लाने का सवाल ही नहीं : चुनाव आयोग

कोलकाता : देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओपी रावत ने चुनावों के लिए बैलेट पेपर को वापस लाने की सभी संभावनाओं को खारिज करते हुए कहा कि ईवीएम को बलि का बकरा बनाया जा रहा है, क्योंकि मशीनें बोल नहीं सकतीं और राजनीतिक दलों को अपनी हार के लिए किसी न किसी को जिम्मदार ठहराने की जरूरत होती है. मर्चेट्स चेंबर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्री द्वारा आयोजित ‘निर्वाचन ईमानदारी और चुनावों में धन की भूमिका’ पर आयोजित एक इंटरएक्टिव सत्र में यहां रावत ने कहा, “प्रणाली की ईमानदारी के बारे में वास्तव में कुछ भी नहीं है, हालांकि जब भी इस मुद्दे पर सवाल उठते हैं, हम स्पष्टीकरण देते हैं.”

उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने पिछली जुलाई को सर्वदलीय बैठक में घोषित किया था कि आगे से सभी चुनाव वोटर वेरिफियेबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपैट) मशीनों के साथ ईवीएम का प्रयोग करके किए जाएंगे. उन्होंने कहा कि मतदान प्रक्रिया में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए ईवीएम के साथ वीवीपैट का प्रयोग भी किया जाएगा.

रावत ने कहा कि राजनीतिक दलों द्वारा ईवीएम को आसानी से बलि का बकरा बना दिया जाता है, क्योंकि वह बोल नहीं सकती और राजनीतिक दलों को अपनी हार का ठीकरा फोड़ने के लिए किसी न किसी चीज की जरूरत होती है.

 

 

 

 

योगी के नेतृत्व में 5 में 4 उपचुनाव हार चुकी है BJP, 2019 पर क्या होगा असर?

योगी के नेतृत्व में 5 में 4 उपचुनाव हार चुकी है BJP, 2019 पर क्या होगा असर?

 

लखनऊ: 2017 विधानसभा चुनाव में मोदी लहर का असर बरकरार रहा और बीजेपी जबरदस्त बहुमत के साथ सरकार बनाई. लेकिन, एक साल के भीतर बीजेपी हांफती नजर आ रही है. योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में उत्तर प्रदेश में बीजेपी चार उपचुनाव हार चुकी है. योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने के बाद उत्तर प्रदेश में तीन लोकसभा और दो विधानसभा उपचुनाव हुए हैं. इनमें से बीजेपी चार उपचुनाव हार गई, जबकि केवल एक विधानसभा चुनाव जीत पाई है. 28 मई को उत्तर प्रदेश में कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा के लिए उपचुनाव हुए. दोनों सीटों पर पहले बीजेपी का कब्जा था. अब दोनों सीटें बीजेपी सी छिन चुकी है. नूरपुर विधानसभा उपचुनाव में सपा के नईमुल हसन ने बीजेपी की प्रत्याशी अवनी सिंह को हराया. जबकि, कैराना लोकसभा उपचुनाव में राष्ट्रीय लोकदल की प्रत्याशी तबस्सुम हसन ने बीजेपी की मृगांका सिंह को भारी मतों से हराया.

सिकंदरा विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी की जीत हुई थी

सीएम योगी के सीएम बनने के बाद कानपुर की सिकंदरा विधानसभा सीट से बीजेपी विधायक मथुरा पाल का निधन हो गया. उपचुनाव में उनके बेटे अजित सिंह पाल, बीजेपी प्रत्याशी, ने सपा के सीमा सचान को करीब 12000 वोटों से हराया. उसके बाद सभी चार उपचुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है. सीएम योगी आदित्यनाथ और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के प्रदेश राजनीति में लौटने के बाद गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुआ. दोनों सीटों पर सपा की जीत हुई.

गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव से शुरू हुआ हार का सिलसिला

गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ थे. उपचुनाव में बीजेपी ने उपेंद्र दत्त शुक्ल को मैदान में उतारा. सपा ने प्रवीण कुमार निषाद को उनके खिलाफ खड़ा किया. सपा प्रत्याशी प्रवीण कुमार ने बीजेपी प्रत्याशी को करीब 22000 वोटों से हरा दिया. फूलपुर के सांसद केशव प्रसाद मौर्य थे. उपचुनाव में बीजेपी ने कौशलेंद्र सिंह को मैदान में उतारा. सपा ने उनके खिलाफ नागेंद्र प्रताप सिंह को मैदान में खड़ा किया. सपा प्रत्याशी ने बीजेपी प्रत्याशी को करीब 60 हजार वोटों से हरा दिया.

कैराना और नूरपुर में बीजेपी की बुरी हार

मई 2018 में कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा के लिए उपचुनाव हुए. कैराना में रालोद की तबस्सुम हसन ने बीजेपी की मृगांका सिंह को करीब 55 हजार वोटों से हरा दिया. नूरपुर में सपा के नईमुल हसन ने बीजेपी की अवनी सिंह को करीब 6200 लोटों से हराया. इस चुनाव में जीत दर्ज करने के लिए बीजेपी ने एड़ी चोटी की जोड़ लगा दी थी.

2019 में होने वाले चुनाव पर दिखेगा असर

2019 लोकसभा चुनाव में बहुत ज्यादा वक्त नहीं रह गया है. अगर बीजेपी को केंद्रीय सत्ता में वापस लौटना है तो उत्तर प्रदेश में उसी जीत को दोहराना होगा, जो 2014 में मिली थी. आगामी लोकसभा चुनाव के लिहाज से यह उपचुनाव बहुत अहम है. बीजेपी की आगे की क्या रणनीति होगी यह आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन जिस तरह तमाम विपक्षी दल एक साथ सुर से सुर मिला रहे हैं, वैसी स्थिति में बीजेपी के लिए 2014 को दोहराना आसान नहीं होगा.