सीआरपीसी एनजीओ की शिकायत पर लखनऊ में कथित अवैध सरोगेसी की जांच के आदेश, एनएचआरसी ने लिया संज्ञान

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने उत्तर प्रदेश के लखनऊ स्थित कुछ आईवीएफ केंद्रों के माध्यम से संचालित कथित अवैध सरोगेसी के संबंध में दायर शिकायत पर संज्ञान लिया है, जहाँ आर्थिक रूप से कमजोर एवं संवेदनशील महिलाओं के व्यावसायिक सरोगेसी के लिए कथित रूप से शोषण किए जाने का आरोप है, जो सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के कथित उल्लंघन के अंतर्गत आता है।

यह शिकायत मनीष जैन, जनसंपर्क अधिकारी, सिटिजन राइट्स प्रोटेक्शन काउंसिल (CRPC) – NGO, द्वारा प्रस्तुत की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि आर्थिक रूप से कमजोर एवं असुरक्षित महिलाएं, जिनमें अविवाहित महिलाएं भी शामिल हैं, को धन के बदले व्यावसायिक सरोगेसी के लिए कथित रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे उनके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका है।

शिकायत में नवजात शिशुओं की कथित अवैध खरीद-फरोख्त को लेकर भी गंभीर चिंता व्यक्त की गई तथा कहा गया कि ऐसी गतिविधियाँ महिलाओं की गरिमा, बाल संरक्षण कानूनों तथा मूल मानवाधिकारों के कथित गंभीर उल्लंघन का रूप ले सकती हैं।

Priyank kanoongo

मामले की गंभीरता को देखते हुए, माननीय सदस्य श्री प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली एनएचआरसी पीठ ने यह टिप्पणी की कि शिकायत में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया पीड़ितों के मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन प्रतीत होते हैं, और संरक्षण मानवाधिकार अधिनियम, 1993 की धारा 12 के अंतर्गत संज्ञान लिया गया।

आयोग द्वारा की गई प्रथम कार्रवाई में, शिकायत की प्रति एनएचआरसी के महानिदेशक (जांच) को प्रेषित करने के निर्देश दिए गए, ताकि एक टीम गठित कर मौके पर जांच कराई जाए तथा चार सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।

इसके पश्चात आयोग ने उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक तथा राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के अध्यक्ष को भी नोटिस जारी करते हुए आरोपों की जांच कर दो सप्ताह के भीतर कार्यवाही प्रतिवेदन (ATR) प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।

शिकायत में आईवीएफ एवं फर्टिलिटी केंद्रों की नियमित और सख्त जांच की आवश्यकता पर बल दिया गया, ताकि कानूनी प्रावधानों का पालन सुनिश्चित हो, कमजोर महिलाओं के कथित शोषण को रोका जा सके, उनके स्वास्थ्य एवं अधिकारों की रक्षा हो सके, तथा चिकित्सा प्रक्रियाओं की आड़ में बच्चों की किसी भी कथित अवैध खरीद-फरोख्त को रोका जा सके।

मनीष का कहना है,

“गरीबी, भय, आर्थिक निर्भरता और कानूनी अधिकारों की जानकारी के अभाव में इस प्रकार के कथित शोषण के मामले अक्सर दब जाते हैं। जब चिकित्सा व्यवस्था का कथित रूप से अवैध व्यावसायिक गतिविधियों के लिए दुरुपयोग किया जाता है, तब यह केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं रह जाता, बल्कि यह महिलाओं की गरिमा, बच्चों के अधिकार और मानवाधिकारों पर सीधा आघात बन जाता है।”

मनीष का आगे कहना है,

मेरा उद्देश्य केवल शिकायत दर्ज कराना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी कमजोर महिला मजबूरी में शोषण का शिकार न बने, कोई भी दंपत्ति अवैध प्रक्रियाओं के जाल में न फँसे, और किसी भी नवजात का जीवन व्यापार का माध्यम न बने। कानून का पालन, पारदर्शिता और जवाबदेही ही इस समस्या का स्थायी समाधान है।”

एनएचआरसी की जांच शाखा को मौके पर जांच के निर्देश दिए जाने तथा विभिन्न प्राधिकरणों को नोटिस जारी होने के बाद, यह मामला अब आधिकारिक जांच के एक महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर चुका है।

मनीष ने अंत में कहा कि यदि समाज और संस्थाएं समय रहते हस्तक्षेप करें, तो अनेक महिलाओं और बच्चों को ऐसे कथित शोषण से बचाया जा सकता है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि इस मामले में निष्पक्ष जांच होगी, दोषियों पर विधिसम्मत कार्रवाई की जाएगी और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सख्त तंत्र विकसित किया जाएगा।

पंचायत के फैसले पर सवाल: राष्ट्रीय अपराध जांच ब्यूरो (NCIB) – NGO की शिकायत पर NHRC का नोटिस

राजस्थान में महिलाओं पर मोबाइल पाबंदी का मामला राजस्थान के जालौर जिले के 15 गांवों में महिलाओं द्वारा कैमरे वाले स्मार्टफोन के उपयोग पर लगाए गए प्रतिबंध के मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने कड़ा संज्ञान लिया है।

यह कार्रवाई राष्ट्रीय अपराध जांच ब्यूरो (NCIB-NGO) द्वारा आयोग को भेजी गई शिकायत के आधार पर की गई है।मामले के अनुसार, जालौर जिले के गाजीपुर गांव में चौधरी समाज की सुंधामाता पट्टी की पंचायत द्वारा यह निर्णय लिया गया कि संबंधित 15 गांवों की महिलाएं कैमरे वाले स्मार्टफोन का उपयोग नहीं करेंगी। पंचायत के आदेश में महिलाओं को केवल की-पैड मोबाइल फोन रखने की अनुमति दी गई है। इसके साथ ही शादी-विवाह, सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने अथवा पड़ोस के घर जाते समय भी मोबाइल फोन साथ रखने पर रोक लगाने की बात कही गई है।

यह पाबंदी 26 जनवरी से लागू किए जाने की घोषणा की गई थी।इस निर्णय को महिला अधिकारों, समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विरुद्ध मानते हुए राष्ट्रीय अपराध जांच ब्यूरो (NCIB) के एक अधिकारी ने पूरे प्रकरण को गंभीर बताते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को औपचारिक शिकायत प्रेषित की। शिकायत में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया कि यह प्रतिबंध केवल महिलाओं पर लागू किया गया है, जो लिंग आधारित भेदभाव की श्रेणी में आता है और संविधान तथा मानवाधिकार सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।

श्री प्रियांक कानूनगो , मेंबर , राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग

शिकायत पर विचार करते हुए NHRC के सदस्य प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली पीठ ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 12 के अंतर्गत मामले का संज्ञान लिया। आयोग ने जालौर के जिलाधिकारी को नोटिस जारी कर निर्देश दिए हैं कि वे पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर दो सप्ताह के भीतर विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट आयोग को प्रस्तुत करें।

NCIB के अधिकारी का बयान:

“किसी भी पंचायत या सामाजिक संस्था को महिलाओं की स्वतंत्रता, समानता और तकनीक तक पहुंच पर रोक लगाने का अधिकार नहीं है। यह आदेश न केवल संविधान के विरुद्ध है, बल्कि महिलाओं के मौलिक और मानवाधिकारों का सीधा उल्लंघन है। NCIB ऐसे हर मामले में पीड़ितों की आवाज बनकर खड़ा रहेगा।”

मानवाधिकार दृष्टिकोण से टिप्पणी:

“लिंग के आधार पर लगाया गया कोई भी सामाजिक प्रतिबंध मानव गरिमा और समानता के सिद्धांतों के खिलाफ है। ऐसे मामलों में त्वरित प्रशासनिक और कानूनी हस्तक्षेप आवश्यक है।”

आभार

राष्ट्रीय अपराध जांच ब्यूरो , महिलाओं के अधिकारों की रक्षा हेतु त्वरित संज्ञान लेने और निष्पक्ष जांच के निर्देश जारी करने के लिए NHRC के माननीय सदस्य श्री प्रियंक कानूनगो का आभार व्यक्त करता है। यह कार्रवाई ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के अधिकारों, स्वतंत्रता और लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक कदम मानी जा रही है।

NCIB ने स्पष्ट किया है कि वह भविष्य में भी महिलाओं और समाज के कमजोर वर्गों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य करता रहेगा।