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रमाई” त्याग समर्पण की प्रेरणास्त्रोत

आदर्शों को अपनाने की आवश्यकता

समता सैनिक दल,भारतीय बौद्ध महासभा साथ बौद्ध अनुयायियों ने किया वंदन

*(सौंसर)* समर्पण,त्याग, संघर्ष और प्रेरणा की मूर्ति रमाबाई आंबेडकर ने अपने स्वास्थ्य कि परवाह न करते हुए आर्थिक तंगी वहीं सामाजिक विषम परिस्थितियों में गरीबी के पारिवारिक वातावरण में डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर जैसे महामानव के निर्माण में योगदान देकर अपना त्याग, बलिदान, समर्पण किया। डॉ  बाबासाहेब आंबेडकर की जीवनसंगिनी माता रमाई अंबेडकर का स्थान बहुजन समाज में अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह केवल डॉ.बाबा साहब अंबेडकर की जीवनसंगिनी नहीं थीं,बल्कि उनके संघर्षमय जीवन की सशक्त सहयात्री, त्याग और धैर्य की प्रतिमूर्ति तथा दलित-वंचित समाज की प्रेरणास्रोत तथा करोड़ो दलितो तो वंचितों बहुजन समाज की मां थी। उक्त विचार समता सैनिक दल,भारतीय बौद्ध महासभा सौंसर द्वारा बुद्ध विहार सौंसर में आयोजित रमाबाई आंबेडकर के जयंती पर वक्ताओं द्वारा विचार रखे गए। रमाई आंबेडकर के छायाचित्र समक्ष मोमबत्ती प्रज्वलन व पुष्प अर्पण कर नमन वंदन किया गया। सामुहिक बुद्ध वंदना हुईं, बच्चों द्वारा केक काटा गया। रमाई आंबेडकर का जयघोष किया।

कार्यक्रम कि अध्यक्षता रेणुकाताई ठवरे द्वारा की गई। समता सैनिक दल से कुसुम सहारे, गिरिजा डोंगरे, कल्पना गजभिए, ज्योति दुफारे,रेखा शेंडे, ज्योति बंसोड, सुषमा दुफारे, एम आर शेंडे, समता सैनिक दल फिल्ड अधिकारी व भारतीय बौद्ध महासभा जिला महासचिव अशोक डोंगरे, भारतीय बौद्ध महासभा कार्यकारी जिलाध्यक्ष नरेंद्र सोमकुंवर गुरुजी, समता सैनिक दल जिला सचिव व भारतीय बौद्ध महासभा तहसील अध्यक्ष प्रवीण ठवरे, शाखा अधिकारी शेषराव बागडे, निशा बंसोड आदि मौजूद थे। जीवनी पर विचार में कहा कि 27 मई 1935 को मात्र 37 वर्ष की आयु में माता माई अंबेडकर का निधन हुआ। डॉ. बाबासाहब अंबेडकर आधुनिक भारत के निर्माता हैं, तो माता रमाई अंबेडकर उनके जीवन की वह मजबूत नींव थीं, जिस पर यह महान व्यक्तित्व बन पाये। कहा कि माता रमाई के आदर्शों को अपने जीवन में आत्मसात करने की आवश्यकता है।

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