एक ओर कांग्रेस नेता राहुल गांधी मंचों से बड़े उद्योगपतियों पर तीखी आलोचना करते दिखाई देते हैं। अडानी समूह और रिलायंस इंडस्ट्रीज़ जैसे नाम भाषणों में सत्ता–पूंजी गठजोड़ के प्रतीक बताकर बदनाम करते हैं। राहुल गांधी के अनुसार कांग्रेस कॉरपोरेट प्रभाव के विरुद्ध खड़ी है, पर व्यवहार की तस्वीर अलग है। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ जी का उदाहरण अक्सर चर्चा में रहता है। पूर्व में कई बार सहित हाल ही में उनका छिंदवाड़ा आगमन भी उसी अडानी समूह के विमान से आना राहुल गांधी को चैलेंज की तरह दिखाता है, वे उसी अडानी के प्लेन से छिंदवाड़ा आते है जिसकी आलोचना राहुल गाँधी अपने भाषणों में करते है। प्रश्न उद्योगपतियों से संपर्क का नहीं, राजनीतिक ईमानदारी का है। क्या पार्टी के भीतर ही राहुल गाँधी की बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाता? या वास्तविकता समझकर भी सार्वजनिक रूप से स्वीकारने का साहस नहीं है